दरिया की कसम, मौजों की कसम

0 CSBHIRIYA
नारी शक्ति कविता

परिवर्तन की पुकार

दरिया की कसम, मौजों की कसम, यह ताना-बाना बदलेगा। तू खुद ही सँभल, तू खुद को बदल, तब ही तो ज़माना बदलेगा।

दस्तूर पुराने सदियों के, ये आए कहाँ से, क्यों आए? कुछ तो सोचो, कुछ तो समझो, ये तुमने हैं क्यों अपनाए?

तू बोलेगी, मुँह खोलेगी, तब ही तो ज़माना बदलेगा।

दरिया की कसम, मौजों की कसम, यह ताना-बाना बदलेगा।

यह पर्दा तुम्हारा कैसा है? क्या यह मज़हब का हिस्सा है? कैसा मज़हब, किसका पर्दा? यह मर्दों का सब किस्सा है।

तू चुप रहकर जो सहती रही, तो क्या यह ज़माना बदलेगा?

दरिया की कसम, मौजों की कसम, यह ताना-बाना बदलेगा।

उत्तर से उठो, दक्षिण से उठो, पूरब से उठो, पश्चिम से उठो। मंदिर से उठो, गलियों से उठो, गाँवों से उठो, शहरों से उठो।

आवाज़ उठा, कदमों को मिला, तब ही तो ज़माना बदलेगा।

दरिया की कसम, मौजों की कसम, यह ताना-बाना बदलेगा।

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